जैविक खेती एवं भारत की सहभागिता जैविक प्रतिभूति प्रणाली

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पिछले दशकों में हमने अधिक से अधिक कृषि उत्पादन प्राप्त करने के लिए रासायनिक खादों, कीटनाशकों आदि का अधिक से अधिक प्रयोग किया, इन रसायनों से हमें कृषि उत्पादन के क्षेत्र में आशा के अनुरूप सफलता भी प्राप्त हुई, किंतु अब इन्हीं रसायनों का दुष्प्रभाव मनुष्यों के स्वास्थ्य एवं मिट्टी पर साफ दिखाई देने लगा है l

अगर हम भारत की बात करें तो आजादी से पहले जो पारंपरिक खेती की जाती थी, वह जैविक खेती ही थी, जिसमें रसायनों के बिना फसलें उगाई जाती थी l खाद के रुप में गोबर का प्रयोग किया जाता था, किंतु आजादी के बाद भारत को कृषि उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर बनाने के लिए रसायनों तथा कीटनाशकों का अधिक से अधिक प्रयोग किया जाने लगा, जिसके परिणाम स्वरुप जैविक तथा अजैविक पदार्थों के चक्र का संतुलन बिगड़ता चला गया l

वर्तमान में मिट्टी की उर्वरा शक्ति तथा वातावरण को देखते हुए, यह आवश्यकता महसूस होने लगी है कि रासायनिक खादों एवं कीटनाशकों का प्रयोग हम कम से कम करें तथा  जैविक खाद एवं जैविक दवाओं को प्रयोग में लाकर अधिक से अधिक उत्पादन प्राप्त किया जाए अर्थात जैविक खेती अपनाई जाए l

पाठ्यक्रम में कौन-कौन सम्मलित हो सकता है?

  • इंटरमीडिएट (कृषि) के छात्र

  • स्नातक (कृषि) के छात्र

  • फसल उत्पादक​ 

पाठ्यक्रम की सामग्री

जैविक खेती

भारत की सहभागिता जैविक प्रतिभूति प्रणाली

मृदा का जैविक रूपांतरण

पीजीएस-इंडिया : संरचना, कार्यकलाप व विभिन्न भागीदार संस्थानों के उत्तरदायित्व

जैविक खेती में पोषण प्रबंधन एवं नाशीजीव प्रबंधन

जैविक उत्पादन हेतु पी.जी.एस.- राष्ट्रीय मानक

प्रमाणपत्र

एजीमुक कोर्स को कॉमन वेल्थ ऑफ़ लर्निंग एवं सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ टेक्निकल एजुकेशन, आई.आई.टी., कानपुर द्वारा चलाया जा रहा है, इस कोर्स में सम्मिलित  छात्र को प्रतिभागिता एवं पात्रता के आधार पर कॉमन वेल्थ ऑफ़ लर्निंग एवं सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ टेक्निकल एजुकेशन, आई.आई.टी., कानपुर द्वारा प्रमाण पत्र प्रदान किया जायेगा |